BASTAR DUSSEHRA – लगातार 75 दिनों तक मनाया जाता है छत्तीसगढ़ का ये ऐतिहासिक पर्व।

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BASTAR DUSSEHRA – लगातार 75 दिनों तक मनाया जाता है छत्तीसगढ़ का ये ऐतिहासिक पर्व।

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भारत को यदि पर्व और त्यौहारों की भूमि कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहां प्रत्येक त्यौहार केवल उत्सव ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर और जनजीवन की पहचान होता है। इन्हीं अनूठे पर्वों में से एक है Bastar dussehra, जो छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की आत्मा से जुड़ा हुआ है। यह पर्व केवल राम-रावण युद्ध या विजयादशमी तक सीमित नहीं, बल्कि देवी की उपासना, जनसहभागिता और आदिवासी परंपराओं का विशाल उत्सव है।

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अनूठा पर्व : 75 दिनों का महोत्सव –

BASTAR DUSSEHRA

देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा 9 या 10 दिनों तक मनाया जाता है, परंतु बस्तर में यह पर्व पूरे 75 दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत श्रावण अमावस्या से होती है और समापन अश्विन शुक्ल दशमी पर। इतने लंबे समय तक चलने वाला यह पर्व न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा उदाहरण है।

देवी दंतेश्वरी की आराधना –

Bastar Dussehra की मूल आत्मा मां दंतेश्वरी देवी हैं, जिन्हें बस्तर की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। कथा के अनुसार, जब सती का शरीर भगवान शिव के त्रिशूल पर विचर रहा था, तब उनके दांत (दंत) इस क्षेत्र में गिरे। तभी से यह स्थान दंतेवाड़ा और देवी दंतेश्वरी के नाम से विख्यात हुआ। हर वर्ष दशहरे पर रानी, पुजारी, माड़िया-मुरिया समेत विभिन्न जनजातियां देवी की आराधना में सम्मिलित होती हैं।

परंपरा और राजपरिवार की भूमिका –

Bastar Dussehra का सीधा संबंध यहां के राजपरिवार से भी है। बस्तर नरेश को देवी का प्रथम सेवक और प्रमुख आयोजक माना जाता है। पर्व की शुरुआत से लेकर अंत तक हर आयोजन में राजा की विशेष भूमिका होती है। यही कारण है कि इस पर्व में आस्था और शासन परंपरा का अनोखा मिश्रण दिखाई देता है।

पर्व की मुख्य रस्में –

Bastar Dussehra को अलग-अलग अनुष्ठानों में बांटा गया है, जिनमें प्रमुख हैं—

पतझड़ पर्व : श्रावण अमावस्या पर शुरुआत होती है।

काछिन गड़ी परघाव : इसमें देवी के रथ के लिए लकड़ी लाने की रस्म होती है। यह कार्य आदिवासी समाज सामूहिक रूप से करता है।

रथारोहण : विशाल रथ का निर्माण किया जाता है, जिसे सैकड़ों लोग खींचते हैं।

मुरीया दरबार : यहां जनजातीय मुखिया, राजा और प्रजा मिलकर सामाजिक-धार्मिक मुद्दों पर विचार करते हैं।

जगदलपुर की शोभायात्राएं : इन दिनों जगदलपुर का नजारा अद्वितीय होता है, जहां हजारों श्रद्धालु देवी की झांकी और उत्सव में शामिल होते हैं।

सामाजिक एकता का संदेश –

BASTAR DUSSEHRA

इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सभी जाति, वर्ग और जनजातियां एकजुट होकर भाग लेती हैं। रथ खींचने से लेकर देवी की पूजा और मेलों के आयोजन तक—हर कार्य सामूहिकता का प्रतीक है। यहां कोई ऊंच-नीच नहीं रहती; सब मिलकर देवी की शरण में होते हैं।

सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन –

Bastar Dussehra केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक धरोहर भी है। इस दौरान पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, हाट-बाजार और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी भी देखने को मिलती है। यही वजह है कि दशहरे के समय देश-विदेश से हजारों पर्यटक बस्तर पहुंचते हैं। उनके लिए यह अवसर आदिवासी संस्कृति को करीब से देखने और समझने का अनूठा मौका होता है।

आधुनिक समय में महत्व –

आज जब आधुनिकता और तकनीक की चमक में परंपराएं धुंधली पड़ रही हैं, बस्तर दशहरा एक प्रेरक उदाहरण है कि कैसे समाज अपनी संस्कृति को जीवंत रख सकता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि क्षेत्रीय पहचान, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रतीक है।

बस्तर दशहरा सामाजिक संरचना का जीवंत चित्र है –

Bastar Dussehra केवल एक पर्व नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा, आस्था और सामाजिक संरचना का जीवंत चित्र है। यह उत्सव हमें यह संदेश देता है कि परंपराओं को संजोकर ही आधुनिक समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रह सकता है। निस्संदेह, बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक धरोहर का चमकता हुआ अध्याय है।

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