SURGUJA – बचपन के बीच बढ़ती असमानता, दिखावे की चमक में दबती संवेदनाएँ, समाज के लिए एक गंभीर सवाल…. विषेष लेख अतुल गुप्ता द्वारा।

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SURGUJA – बचपन के बीच बढ़ती असमानता, दिखावे की चमक में दबती संवेदनाएँ, समाज के लिए एक गंभीर सवाल…. विषेष लेख अतुल गुप्ता द्वारा।

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Surguja मेरा नाम अतुल गुप्ता है। पिछले लगभग चार वर्षों से मैं सरगुजा पुलिस के साथ साइबर वॉलंटियर एवं पुलिस मितान के रूप में जुड़ा हुआ हूँ। इस दौरान मुझे बच्चों के साथ काम करने, स्कूलों और कॉलेजों में जाने, सड़कों पर चल रहे जागरूकता अभियानों में भाग लेने और समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद करने का अवसर मिला। इन अनुभवों ने मुझे केवल व्यवस्था को देखने का नहीं, बल्कि बच्चों के मन को समझने का अवसर दिया। उनकी सोच, उनके डर, उनके सपने और उनकी चुप्पी को।

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तेज़ी से बढ़ता शहर और गहराती असमानता –

मैं अंबिकापुर, जिला Surguja की बात कर रहा हूँ, एक ऐसा शहर जो तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन जहाँ सामाजिक असमानता भी उतनी ही स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहाँ एक ओर अत्यंत संपन्न परिवारों के बच्चे हैं, जिनके लिए सुविधाएँ सहज हैं, और दूसरी ओर गरीब, किसान और मेहनतकश परिवारों के बच्चे हैं, जिनके माता-पिता सीमित साधनों के बावजूद अपने बच्चों के भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं।

माता-पिता के छोटे सपने, बड़ा संघर्ष –

Surguja मैंने ऐसे अनेक माता-पिता देखे हैं जो अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों में कटौती करके, पैसे जोड़-जोड़कर और कभी परिचितों से सहायता लेकर अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाख़िला दिलाते हैं। उनका उद्देश्य केवल इतना होता है कि उनका बच्चा भी समान अवसर पाए, आत्मविश्वास के साथ पढ़े और किसी के सामने स्वयं को कम न समझे। यह एक साधारण-सा सपना है, लेकिन इसके पीछे असाधारण संघर्ष और त्याग छुपा होता है।

दिखावा, प्रतिस्पर्धा और बढ़ता दबाव –

इसी समाज में कुछ ऐसे दृश्य भी हैं जो मुझे भीतर तक सोचने पर मजबूर कर देते हैं। आज जब यातायात सुरक्षा माह चल रहा है, तब भी यह देखना सामान्य हो गया है कि कुछ बच्चे महंगे ब्रांडेड मोबाइल फ़ोन लेकर स्कूल आते-जाते हैं। फेयरवेल जैसे अवसर अब केवल विदाई नहीं रहे, बल्कि धीरे-धीरे दिखावे और तुलना का माध्यम बनते जा रहे हैं। कोट-पैंट पहनना अब खुशी नहीं, बल्कि कई बच्चों के लिए एक अनकहा दबाव और प्रतिस्पर्धा बन चुका है।

SURGUJA

स्कूल से बाहर की चमक और उसकी कीमत –

Surguja – यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अधिकांश स्कूल अपने स्तर पर फेयरवेल जैसे कार्यक्रम मर्यादित और समान रूप से आयोजित करते हैं, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब स्कूल के बाहर समाज के स्तर पर बड़े-बड़े होटल बुक किए जाते हैं, सड़कों पर शोर-शराबा होता है, पटाखे फोड़े जाते हैं और कभी-कभी यातायात नियमों की अनदेखी करते हुए कारों की छतों पर चढ़कर वीडियो बनाए जाते हैं।

Surguja इसका सीधा असर उन बच्चों के मन पर पड़ता है जो इस चमक-दमक का हिस्सा नहीं बन पाते। वे चुप रहते हैं, शिकायत नहीं करते और धीरे-धीरे पीछे हट जाते हैं, इसलिए नहीं कि उनमें क्षमता नहीं होती, बल्कि इसलिए कि वे जानते हैं अगर कोई गलती हो गई या कोई कानूनी परेशानी आ गई तो उनके माता-पिता शायद उसे संभाल नहीं पाएँगे।

समानता, कानून और हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी –

Surguja – वे बच्चे जानते हैं कि वे होटल के लिए चंदा नहीं दे सकते, वे जानते हैं कि वे महंगे कपड़े नहीं खरीद सकते और इसी कारण उनके मन में यह भावना जन्म लेने लगती है कि शायद वे इस भीड़ का हिस्सा नहीं हैं। यही वह बिंदु है जहाँ असमानता चुपचाप बच्चों के मन में प्रवेश कर जाती है। मेरा प्रश्न बहुत सीधा है, जब स्कूल और कॉलेज शिक्षा के मंदिर हैं, तो क्या हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि बच्चों के मन में समानता, संयम और संवेदनशीलता की भावना को और मज़बूत किया जाए।

Surguja – फेयरवेल जैसे अवसर बच्चों के जीवन की सबसे सुंदर स्मृतियों में शामिल होने चाहिए, ऐसी स्मृतियाँ जिनमें कोई खुद को अलग-थलग या छोटा महसूस न करे। सबसे चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब कुछ बच्चे यह मानने लगते हैं कि यातायात नियमों और कानूनों को तोड़ा जा सकता है, क्योंकि उनके पास उन्हें बचाने के साधन मौजूद हैं, जबकि सच्चाई यह है कि कानून सबके लिए समान है और सड़कें हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि वह भी वही हैं जो हम हैं, न कोई ऊपर है, न कोई नीचे, सब समान हैं।

Surguja – यदि हम बच्चों को प्रारंभ से यह सिखा सकें कि साथ चलना, साथ रुकना और साथ आगे बढ़ना ही सच्ची सफलता है, तो शायद भविष्य में हमें कम टकराव, कम असंवेदनशीलता और अधिक समझदारी देखने को मिले। यह लेख किसी संस्था या व्यक्ति पर आरोप नहीं है, बल्कि यह एक अनुभव, एक आत्मचिंतन और एक विनम्र अपील है कि हम अपने बच्चों को केवल आगे बढ़ना नहीं, बल्कि साथ लेकर आगे बढ़ना भी सिखाएँ।

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