JASHPUR NAGLOK – जहां पाए जाते हैं विभिन्न प्रजातियों के सांप।
छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जो चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ है। यहां की पहचान केवल विविध प्रकार की वनस्पतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता और जीव-जंतुओं की अनगिनत प्रजातियां भी इसकी विशेषता हैं। इन्हीं विशेष जिलों में से एक है जशपुर, जिसे इसकी अद्वितीय प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता के कारण “नागलोक” के नाम से भी जाना जाता है।
तपकरा – सांपों का घर –
Jashpur naglok – जशपुर जिले का तपकरा क्षेत्र सांपों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहां अब तक 40 से अधिक प्रजातियों के सांप पाए जाने की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें से लगभग पांच प्रजातियां बेहद जहरीली हैं। बरसात का मौसम आते ही यह इलाका सांपों की गतिविधियों से जीवंत हो उठता है। कॉमन करैत, कोबरा, बैंडेड करैत जैसे जहरीले सांप अक्सर ग्रामीण इलाकों और यहां तक कि घरों के आसपास भी नजर आ जाते हैं।

स्नेक पार्क की योजना –
Jashpur naglok – छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने यहां स्नेक पार्क स्थापित करने की मंजूरी दे दी है। जिला प्रशासन ने इसके लिए सर्वे की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। यह पार्क न केवल सांपों के संरक्षण और अध्ययन का केंद्र होगा, बल्कि लोगों में सांपों के प्रति जागरूकता फैलाने का भी एक बड़ा माध्यम बनेगा।
सर्पदंश और जागरूकता –
Jashpur naglok – बरसात के मौसम में सर्पदंश के मामले जशपुर में सबसे ज्यादा सामने आते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी लोग जमीन पर सोते हैं, जिससे जहरीले सांपों के काटने का खतरा बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विभाग समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को सांप के काटने की स्थिति में तुरंत अस्पताल पहुंचने और सही उपचार लेने के लिए प्रेरित करता है।

पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व –
तपकरा क्षेत्र केवल सांपों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने रहस्यमयी स्थलों के लिए भी मशहूर है। यहां बहने वाली इव नदी के किनारे एक प्राचीन महादेव मंदिर स्थित है। मंदिर से कुछ दूरी पर ‘पाताल द्वार’ या ‘कोतेविरा’ नामक गुफा है, जिसके बारे में मान्यता है कि जो इसमें प्रवेश करता है, वह कभी वापस नहीं आता।
यहां शूर्पणखा भगवान शिव की करती थी आराधना –
Jashpur naglok – स्थानीय कथाओं के अनुसार, द्वापर और त्रेता युग में यह स्थान धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। कहा जाता है कि रावण की बहन शूर्पणखा यहां भगवान शिव की आराधना करती थी। वनवास काल में भगवान राम और माता सीता भी यहां पूजा करने आए थे, और नागराज स्वयं आकर उनकी रक्षा करते थे।
महाभारत काल की एक कथा के अनुसार, जब दुर्योधन ने भीम को विषाक्त खीर खिलाकर नदी में बहा दिया, तो बहते-बहते भीम इव नदी के पास पहुंचे, जहां नागकन्याओं ने उन्हें बचाया और नागराज ने उनका उपचार कर उन्हें जीवनदान दिया। यहीं पर भीम को ‘हजार हाथियों का बल’ प्राप्त हुआ।

नागलोक की पहचान –
आज Jashpur naglok केवल सांपों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने रहस्यों, लोककथाओं और प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता है। यहां का हर कोना प्रकृति, पौराणिक कथाओं और रोमांच का संगम है, जो इसे छत्तीसगढ़ का एक अद्वितीय पर्यटन स्थल बनाता है।